कम हुई मिट्टी के दियो की मांग
पुर्वांचल एक्सप्रेस न्यूज़ संवाददाता ज़ायेद शेख
जौनपुर जफराबाद। दीपावली का त्यौहार नजदीक आते ही कुम्हारों का उम्मीदों का चाक घूमना शुरू हो जाता है। नए-नए डिजाइन और आकार की मिट्टी के दीपक बनाना शुरू कर देते हैं, ताकि दीपावली पर लोग के घर रोशन हो सकें, लेकिन इन कुम्हारों के जीवन में बीते कई वर्षों से 'रोशनी' का इंतजार है। बाजार में चाइनीज आइटम की वजह से कुम्हारों का परंपरागत मिट्टी के दीपकों का व्यवसाय मानो चौपट हो गया है। महंगी मिट्टी ने भी परेशानी को और बढ़ा दिया है. हालात ये हैं कि अब यह परंपरागत व्यवसाय अधिकतर बुजुर्ग ही संभाल रहे हैं। नई पीढ़ी के युवा इस मंद पड़े व्यवसाय से विमुख होकर अन्य रोजगारों की ओर मुड़ गए हैं। अब घरों में नयी पीढ़ी के दस्तक के चलते चाइनीज झालरों क्रेज बढ़ गया है। लोगों में मिट्दी के दीपक जलाने के प्रति रुझान कम हो गया है। नयी पीढ़ी की मानें तो मिट्टी के दीपक में तेल फिर बाती फिर जलाने की नौबत के चलते समय भी अधिक लगता है। इससे इतर झालरों को लगाया फिर जलना शुरू दीपक से कम समय में झालर पूरे घर को रौशन कर देता है। कुम्हारों की मानें तो 20 साल पूर्व लोग मिट्टी के दीपकों से घरों को रौशन करते थे। दीपक की जगमगाहट त्योहारों की नई ऊर्जा प्रदान करती थी कम हुई मिट्टी के दीयों की मांग चकघाटमपुर गांव के कुम्हार दीप चंद्र प्रजापति ने बताया कि वह 30 साल से मिट्टी के दीपक बनाने का काम कर रहे हैं। अब मिट्टी बहुत महंगी हो गई, महंगी मिट्टी की वजह से दीपक बनाने में लागत अधिक आ रही है और प्रॉफिट कम मिल रहा है दीपावली पर रोशनी व सजावट के लिए चाइनीज लाइटें आने की वजह से मिट्टी के दीपकों की डिमांड भी ना के बराबर रह गई है परंपरागत व्यवसाय छोड़ रहे युवा दीप चन्द्र प्रजापति ने बताया कि अत्यधिक महगाई और कम मुनाफा मुनाफे की वजह से परिवार का पालन करना मुश्किल हो गया है। अत्यधिक मेहनत और काम के बदले इतने पैसे नहीं मिलते है, इसलिए प्रजापति समाज के युवा अपना पुश्तैनी काम करने से परहेज कर रहे हैं। युवा दीपक या मिट्टी के बर्तन बनाने के बजाय या तो मजदूरी करने चले जाते हैं या फिर अन्य व्यवसाय करने लगे है इलेक्ट्रिक चाक के बाद भी धंधा मंदा दीप चंद्र प्रजापति जैसे तमाम कुम्हारों ने बताया कि अब हाथ से संचालित होने वाला चाक बहुत्त की कम रह गया है। कुछ सरकार तो कुछ बैंकों से इलेक्ट्रिक चाक सभी के पास उपलब्ध है बावजूद इसके नयी पीढी इस धंधे से तौबा कर रही है। महानगरी की तरफ नौकरी के लिए सभी गाया है महंगी होती मिट्टी, कम मुनाफा दीप चन्द्र प्रजापति और फूलचंद प्रजापति ने बताया कि जनसंख्या बढ़ने की वजह से ग्रामीणों के आसपास खेतों में घर बन गई है, इसलिए अब मिट्टी दूरदराज के गांवों से मंगवानी पड़ती है, इसलिए मिट्टी महंगी पड़ रही है। एक ट्रॉली मिट्टी ढाई से चार हजार रुपए तक मिल रही है। मिट्टी के सामान को पकाने के लिए इंधन भी महंगा आता है। थोक में मिट्टी के 50 रुपए में 100 दीपक बेचे जा रहे हैं। एक मिट्टी के दीपक से 50 पैसे की आय हो रही है। इसमें भी मुनाफा कम मिल रहा है। इसमें भी ग्राहक मोल- भाव करता है तो और भी कम कीमत में बेचने पड़ते हैं।