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श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास ने दंडी सन्यासियों के लिए फिर शुरू की अन्नसेवा, मां अन्नपूर्णा की विधिविधान से हुई पूजा

Updated on: 03 July, 2026

संवाददाता पूर्वांचल एक्सप्रेस न्यूज़

 

*वाराणसी।* श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास ने सनातन परंपराओं के संरक्षण और संत समाज के सम्मान की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए दंडी सन्यासियों के लिए अन्नसेवा और दक्षिणा वितरण की परंपरा को पुनः प्रारंभ किया। कोरोना महामारी के दौरान यह सेवा अस्थायी रूप से स्थगित कर दी गई थी, लेकिन अब इसे फिर से नियमित रूप से संचालित किया जाएगा। शनिवार को माँ अन्नपूर्णा मंदिर में विधिवत पूजा-अर्चना के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई। इसके बाद टेढ़ीनीम स्थित अन्नक्षेत्र भवन में विशेष आयोजन किया गया। 

 

इस सेवा की बहाली का निर्णय दंडी सन्यासियों की ओर से उठाई गई समस्याओं के समाधान स्वरूप लिया गया। उन्होंने हाल ही में मंदिर प्रशासन से आग्रह किया था कि वर्षों से चलती आ रही यह परंपरा पुनः शुरू की जाए। इस पर मुख्य कार्यपालक अधिकारी ने उनकी बातों को गंभीरता से लेते हुए इसे पुनः प्रारंभ करने का आश्वासन दिया था। 

 

शनिवार को मां अन्नपूर्णा की पूजा के बाद दंडी सन्यासियों को अन्नक्षेत्र में सात्विक प्रसाद वितरित किया गया। इस अवसर पर वाराणसी मंडल के मंडलायुक्त की अध्यक्षता में मंदिर प्रशासन के अधिकारी, डिप्टी कलेक्टर, उप जिलाधिकारी, नायब तहसीलदार, डीसीपी (सुरक्षा) सहित अन्य अधिकारी उपस्थित रहे। 

 

कार्यक्रम के दौरान मंडलायुक्त ने दंडी सन्यासियों को दक्षिणा प्रदान की और मंदिर न्यास की ओर से उन्हें आश्वस्त किया कि इस सेवा में कोई व्यवधान नहीं आएगा। उन्होंने कहा कि श्री काशी विश्वनाथ मंदिर की आय को सनातन परंपराओं और धार्मिक कार्यों की सेवा में लगातार उपयोग किया जाता रहा है और आगे भी इसे प्राथमिकता दी जाएगी।

 

दंडी सन्यासियों ने इस परंपरा के पुनः शुभारंभ पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए मंदिर न्यास और प्रशासन के प्रति आभार जताया। उन्होंने कहा कि यह कदम न केवल उनके लिए सम्मानजनक है बल्कि संत समाज के प्रति मंदिर प्रशासन की संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता को भी प्रदर्शित करता है।

 

मंदिर प्रशासन ने स्पष्ट किया कि यह सेवा अब नियमित रूप से चलती रहेगी, ताकि दंडी सन्यासियों को समय पर भोजन और दक्षिणा मिल सके। यह पहल न केवल संत समाज के कल्याण की दिशा में है बल्कि सनातन संस्कृति और धार्मिक परंपराओं के संरक्षण का भी प्रतीक है।

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