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*शासनादेश को दरकिनार कर धड़ल्ले से जारी हुआ अनुसूचित जनजाति का प्रमाण पत्र* 

Updated on: 02 July, 2026

अतुल राय की खास रिपोर्ट

 

वाराणसी। उत्तर प्रदेश में गोंड समुदाय को अनुसूचित जाति से निकालकर अनुसूचित जनजाति में डालने वाला विधेयक लोकसभा एवं राज्यसभा मे ध्वनि मत से पारित हो गया। अब प्रदेश के कुछ जनपदों में गोंड जाति को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने का रास्ता तो साफ है, लेकिन यदि शासनादेश की बात करें तो स्पष्ट है कि गोड़ जाति के भड़भूजा को पिछड़ा वर्ग में शामिल किया गया है। जिससे पिछले कुछ वर्षो में क्षेत्रीय लेखपालों के मिलीभगत जारी भड़भूजा गोड़ के अनुसूचित जनजाति के प्रमाणपत्र पत्र पर निरस्तीकरण की तलवार लटक सकती है। सूत्रों की माने तो गोड़ भड़भुजा को इसका लाभ नहीं मिलेगा और पिछले वर्षो जारी उनका अनुसूचित जनजाति का प्रमाण पत्र भी निरस्त हो सकता है।

वाराणसी में कई ग्राम पंचायतों में पिछड़ी जाति के भाड़भुजा या भुर्जी गोंड लिखकर अनुसूचित जनजाति का प्रमाण पत्र बनाकर लाभ ले रहे हैं इसी क्रम में वाराणसी के पिन्ड्र तहसील के महगाव गांव का भी स्थिति है यहां पर शिकायतकर्ता संतोष मिश्रा ने गोड़ एवं अन्य लोगों पर पर आरोप लगाया है कि यह गोंड नही बल्की गोड़ है जो अनुसूचित जनजाति के नहीं है बल्कि पिछड़ी जाति भडभुजा जिनका काम दाना भुनना है उनके आचार व्यवहार में कहीं भी जनजाति जैसा नहीं है जिसकी जांच आख्या रिपोर्ट में प्रशासन ने माना है कि महगाव और अगल-बगल क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति नहीं है गोंड जाति कैमूर क्षेत्र के सोनभद्र मिर्जापुर में पाया जाता है उत्तर गोंड और गोड़ में अंतर है इस संबंध में अधिवक्ता प्रिंस चौबे से पूछा गया उन्होंने बताया कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति इसलिए बनाई गई क्योंकि वह अस्पृश्यता की शिकार थी जबकि भडभुजा गोड़ उच्च वर्गों के यहां शादी विवाह में पानी भरने का काम एवं दाना भुनने का कार्य करते रहे हैं यह कभी छुआछूत के शिकार नहीं रहे हैं इसीलिए यह पिछड़ी जाति में है लाभ लेने के लिए लोग अनुसूचित जनजाति बन जा रहे हैं इसी मामले में श्याम बाबू कांस्टेबल से एसडीएम बने थे लेकिन बाद में मूल आदिवासी जनजाति संस्था के अध्यक्ष विजय बहादुर चौधरी की शिकायत पर उनका प्रमाण पत्र निरस्त कर दिया गया था उन्होंने बताया था कि अपने रिश्तेदार के प्रमाण पत्र से उन्होंने प्रमाण पत्र जारी कराया था जबकि हाईकोर्ट का स्पष्ट उल्लेख है कि जाति का निर्धारण पिता के वंश से होता है ना कि रिश्तेदारों से वाराणसी के कई ग्राम पंचायतों में इसी तरीके से लोग गलत तरीके से अनुसूचित जनजाति का प्रमाण पत्र जारी करा रहे हैं जो असली अनुसूचित जाति एवं जनजातियों का हक मार रहे हैं वही वाराणसी सदर तहसील पर बाकायदा नोटिस चिपका है कि गोड़ टाइटल भड़भुजा के लिए होता है जाति प्रमाण पत्र बनाते समय बिंदु पर ध्यान दें गोंड जनजाति होते हैं जबकि गोड़ पिछड़ी जाति देखने में यह दोनों शब्द एक ही लगते हैं लेकिन मामूली अंतर होता है गोंड में बिंदु गों पर लगता है जो जनजाति होती है जबकि पिछड़ी जाति के गोड़ पर बिंदु की मात्रा ड़ पर लगता है इसी का लाभ उठाकर फर्जी जनजाति प्रमाण पत्र बनवाया जा रहा है 1356 फसली में अगर पुरानी रिकॉर्ड देखा जाए तो मामला समझ में आ जाता है तहसीलों में अब सख्त नियम लागू हो गया है 6 बिंदुओं पर लेखपाल एवं कानूनगो लोगों से स्पष्ट आख्या मांगा जा रहा है जिससे कुछ हद तक लगाम लगा है अभी कई क्षेत्रों में गहनता से जांच करने की जरूरत है |

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