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जातीय भेदभाव, विरोध और सामाजिक दबाव के बीच इंसाफ की जीत: समाजसेवी प्रिंस चौबे के प्रयास से मृतक किसान की पत्नी को मिला ₹5 लाख का मुआवजा*

04 July, 2026  |  01:07 AM
जातीय भेदभाव, विरोध और सामाजिक दबाव के बीच इंसाफ की जीत: समाजसेवी प्रिंस चौबे के प्रयास से मृतक किसान की पत्नी को मिला ₹5 लाख का मुआवजा*

संवाददाता पूर्वांचल एक्सप्रेस न्यूज़

 

वाराणसी (हरहुआ) निदौरा गांव में बीते वर्ष एक किसान की खेत में करंट लगने से हुई मौत के बाद अब, आठ महीने की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, मृतक की पत्नी को ₹5 लाख की आर्थिक सहायता प्राप्त हुई है। यह राहत मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना बीमा योजना के तहत मिली है, जिसे समाजसेवी और अधिवक्ता प्रिंस चौबे की सतत पहल और कानूनी प्रयासों से संभव बनाया गया।

दुर्घटना, विरोध और सामाजिक बहिष्कार 6 अक्टूबर 2024 को निदौरा गांव में खेत में करंट लगने से पोल्हावन पटेल नामक किसान की मौत हो गई थी। घटना के बाद जब समाजसेवी प्रिंस चौबे ने पोस्टमार्टम और कानूनी प्रक्रिया की मांग की, तो गांव के कुछ लोगों ने इसका खुलकर विरोध किया। आरोप लगाए गए कि वह "गांव में दो परिवारों को आपस में भिड़ा रहे हैं" और मृतक का बिना पोस्टमार्टम अंतिम संस्कार करने की मांग की गई।

घटना स्थल जिस खेत में हुई वह संजय पटेल नामक व्यक्ति का था, जिसके चलते मामला जातिगत तनाव की ओर भी मुड़ गया। चौबे को इस दौरान जातीय टिप्पणियों, सामाजिक बहिष्कार और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। कानूनी प्रक्रिया और सामाजिक संदेश प्रिंस चौबे ने न सिर्फ ग्रामीणों को समझाया कि कानूनी प्रक्रिया का पालन कितना जरूरी है, बल्कि उन्होंने खुद FIR, पंचनामा और पोस्टमार्टम रिपोर्ट जैसे आवश्यक दस्तावेज़ तैयार करवाए। इसके बाद मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना बीमा योजना के तहत आवेदन किया गया, जिसका परिणाम अब सामने आया — मंजू देवी को ₹5 लाख की राहत राशि प्राप्त हुई है

विरोध से सराहना तक*

आज वही लोग जो पोस्टमार्टम के विरोध में थे और चौबे पर सवाल उठा रहे थे, वही अब उनकी सराहना कर रहे हैं। गांव में समाजसेवी की भूमिका को अब सकारात्मक दृष्टि से देखा जा रहा है।

 

प्रिंस चौबे ने कहा,

सरकारी योजनाएं सबके लिए होती हैं, लेकिन उनका लाभ लेने के लिए कानूनी प्रक्रिया का सही पालन जरूरी है। हादसे के बाद भावनाओं में बहकर जरूरी क़ानूनी कदमों को नज़रअंदाज़ करना भविष्य में और बड़ी तकलीफ दे सकता है।”

यह केवल एक मुआवज़े की कहानी नहीं है, यह उदाहरण है कि जब कोई व्यक्ति सत्य, संवेदनशीलता और साहस के साथ खड़ा होता है, तो जातीय भेदभाव, सामाजिक दबाव और विरोध के बावजूद न्याय संभव है। प्रिंस चौबे का यह कदम न केवल एक पीड़ित परिवार को राहत देने वाला साबित हुआ, बल्कि समाज को यह भी सिखाया कि विरोध और अफवाहों से ऊपर उठकर, कानून और इंसाफ की राह पर चलना ही सच्ची समाजसेवा है।

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