महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के निधन से दुनिया के वे सारे लोग दुखी होंगे जो परंपराओं का आदर करते हैं. ये अजीब सी बात है कि एलिजाबेथ रानी बनने के बारे में नहीं सोचती थी. उनके ताऊ एडवर्ड अष्टम ब्रिटेन के राजा थे. एडवर्ड के छोटे भाई की बेटी होने के कारण एलिजाबेथ को राजकाज से बहुत ज्यादा मतलब नहीं था. ताऊ एडवर्ड अष्टम की मृत्यु के बाद इनके पिता जॉर्ज षष्टम ( जार्ज सिक्थ) ब्रिटेन के राजा बनाए गए. तब परिवार को लगा कि एलिजाबेथ को राजगद्दी संभालनी पड़ सकती है.
दरअसल ताऊ एडवर्ज अष्टम एक सामान्य नागरिक सिंप्सन से शादी करना चाहते थे. इसके लिए ब्रिटेन की संसद की अनुमति जरूरी थी. तमाम औपचारिकताओं के बाद भी ब्रिटिश संसद ने राजा को सामान्य नागरिक से शादी की इजाजत नहीं दी. इस पर एलिजाबेथ के ताऊ ने तख्त छोड़ने का फैसला लिया. उनके इस फैसले पर भारत के महाकवि निराला ने बहुत ही प्रशांसा वाली कविता भी लिखी. ये भी याद करने की बात है कि उसी महाकवि ने जार्ज पंचम पर कविता लिखने से मना कर दिया था.
बहरहाल, एडवर्ड अष्टम के राज्य छोड़ने के बाद जब पिता जार्ज षष्टम ने राजकाज संभाला तो दौर बहुत अच्छा नहीं था. युद्ध और शांति के उस काल में उनकी आदतें नहीं बदलीं और वे जल्द ही बीमारी से हार गए. उन्होंने वसीयत में अपनी प्यारी बेटी लिलीबट को अपना उत्तराधिकारी चुना.
ये भी कम त्रासद नहीं है कि इन्हें अपने पिता की मौत की खबर उस समय मिली जब वे ब्रिटेन से बहुत दूर थी. बहरहाल तब तक इनकी शादी प्रिंस फिलिप से हो चुकी थी. 1952 में जब महारानी एलिजाबेथ का राज्याभिषेक हुआ तो उनकी उम्र महज 26 साल की थी. महारानी का जन्म 21 अप्रेल 1926 को हुआ था. उनकी शादी उन्हीं की जिद के बाद प्रिंस का ओहदा पाने वाले फिलिप से 1947 में हुई थी, जो जर्मन मूल के थे. इस शादी के विरोध में खुद इनके पिता समेत राजघराने के बहुत सारे ओहदेदार थे.
इस शादी से महारानी प्रिंस चार्ल्स समेत चार संतानों की माता बनी. प्रिंस चार्ल्स की शादी प्रिंसेज डायना से हुई. प्रिंसेज डॉयना को लेकर ब्रिटिश राजपरिवार एक बार फिर से दुनिया भर में चर्चा में रहा.
ये ध्यान रखने वाली बात है कि जब महारानी एलिजाबेथ द्वितीय ने राजकाज संभाला तो दुनिया की राजनीति बहुत ही पथरीले रास्ते पर चल रही थी. बहुत सारे गुलाम देश ब्रिटेन का छत्र के नीचे से हट गए थे या बगावत कर रहे थे, फिर भी राष्ट्रकुल या कॉमनवेल्थ के काम-काज से रानी से दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींचा. ये वही समय था कि दुनिया के देशों के बीच रिश्तों के बारे में सोच-समझ पैदा करने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ का जन्म हो चुका था. फिर भी दुनिया को राष्ट्रकुल के जरिए जोड़ने को लेकर रानी का सम्मान बरकरार रहा और उनकी अधीनता को मानने वाले देशों में बहुत सारे आजाद, संप्रभु राष्ट्र भी थे.
ये भी कम रोचक नहीं है कि रानी न तो कोई पासपोर्ट रखती रही हैं और न ही ड्राइविंग लाइसेंस, क्योंकि ये माना जाता है कि ब्रिटेन समेत बहुत सारे देशों में जब पासपोर्ट और ड्राइविंग लाइसेंस रानी को नाम से ही जारी होते हैं तो उन्हें कौन पासपोर्ट जारी करेगा. ब्रिटिश राजमहल की इस परंपरा का पालन दुनिया के तकरीबन सारे देश करते रहे हैं.
तकरीबन 70 साल तक शासन करने वाली इस रानी के मुकुट में कोहिनूर ही नहीं रहा बल्कि सबका प्यार और सम्मान भी इनके हिस्से में रहा है. अपने शासन काल में उन्होंने कुल 15 प्रधानमंत्रियों को शपथ दिलायी और ये भी दिलचस्प है कि अब से दो दिन पहले ही ब्रिटेन की प्रधानमंत्री ट्रस ने अपनी दादी की उम्र की महारानी एलिजाबेथ का हाथ चूमा था. दुनिया की राजनीति में अपना अलग स्थान रखने वाले विंस्टन चर्चिल समेत 14 और प्रधानमंत्रियों के साथ काम करने के बाद भी रानी का पूरा कार्यकाल उतना ही चमकदार और चकाचौंध पैदा करने वाला रहा जितना कि उनके मुकुट में चमकने वाला हीरा.